श्रीकृष्ण किसके लिए कर्म करते हैं? || आचार्य प्रशांत, कर्मयोग पर (2017)

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शब्दयोग सत्संग
१७ फ़रवरी, २०१७
बोधस्थल, नॉएडा

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः |
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः || २३ ||

हे पार्थ! यदि मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूं तो बड़ी हानि हो जाए, क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

(अध्याय ३, श्लोक २३)

उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् |
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः || २४ ||

यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का उत्पन्न करने वाला होऊं तथा प्रजा का नाश करने वाला बनूँ।

(अध्याय ३, श्लोक २४)

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्र्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् || २५ ||

हे भारत! जिस प्रकार अज्ञानी कर्म में आसक्त होकर कर्म करता है, उसी प्रकार विद्वान् भी अनासक्त होकर लोक-संग्रह के लिए कर्म करे।

(अध्याय ३, श्लोक २५)

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् |
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् || २६ ||

ज्ञानी पुरुष सकाम कर्म में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम पैदा न करे। किन्तु स्वयं शास्त्रविहित कर्म करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये।




(अध्याय ३, श्लोक २६)

प्रसंग:
श्रीकृष्ण किसके लिए कर्म करते हैं?
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का उत्पन्न करने वाला होऊं तथा प्रजा का नाश करने वाला बनूँ। ऐसा क्यों कह रहे है श्रीकृष्ण?
वर्ण संकर क्या आशय है?
हे पार्थ! यदि मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूं तो बड़ी हानि हो जाए, क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। यहाँ "सावधान" कहने से क्या आशय है?

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