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शब्दयोग सत्संग
९ मार्च २०१४
अद्वैत बोधस्थल, नॉएडा
श्रीमद्भगवद्गीता(अध्याय 4 श्लोक 11)
ये यथा माम् प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥
अर्थ:
हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ, वास्तव में सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही व्यवहार का अनुसरण करते हैं।
प्रसंग:
"जो मुझे जैसा स्थान देता है, मैं भी उसे वैसा ही स्थान देता हूँ" ऐसा क्यों कह रहे है कृष्ण ?
अष्टावक्र कहते है, मुझे ब्रह्मा के अलावा कुछ नहीं दिखती है | यहाँ "ब्रह्मा" कहने से उनका क्या आशय है?
क्या जो हम अस्तित्व में देखते है वही पाते है?